क्या रियल-टाइम डैशबोर्ड पत्रकारों को क्लिक के पीछे भागने पर मजबूर करता है?

20 सितंबर 2026 · Benjamin Rüegg

मछली पकड़ने के काँटे पर एक लेख का कार्ड लटका है और कई नीले व काले माउस पॉइंटर उसकी ओर बढ़ रहे हैं।
Benjamin Rüegg
Benjamin Rüegg
संस्थापक, NowMetrix
Benjamin 15 से अधिक वर्षों से सॉफ़्टवेयर बना रहे हैं और “Blick” व “20 Minuten” के साथ काम से न्यूज़रूम की ज़िंदगी जानते हैं।

जब किसी न्यूज़रूम की कामयाबी सिर्फ़ इस बात से आँकी जाने लगे कि कौन-सी खबर सबसे ज़्यादा क्लिक बटोरती है, तो कहीं कुछ ग़लत हो रहा है। ऐसे में काफ़ी मेहनत से की गई पड़ताल भी जल्दी में लिखी गई, आक्रोश भड़काने वाली खबर के मुकाबले फीकी पड़ सकती है। कम-से-कम स्क्रीन पर तो यही दिख सकता है।

इसलिए पत्रकारिता में रीयल-टाइम एनालिटिक्स को लेकर होने वाली आलोचना समझ में आती है। क्लिकबेट, पाठकों की संख्या बढ़ाने का दबाव, ग्राफ़ में अगले उछाल के पीछे लगातार भागना: ये चिंताएँ वाजिब हैं। जिसकी नज़र हमेशा आँकड़ों पर रहती है, वह किसी समय अपना काम मुख्य रूप से उन्हीं के हिसाब से करने लग सकता है।

हम ख़ुद भी संपादकीय टीमों के लिए NowMetrix नाम का एक रीयल-टाइम एनालिटिक्स टूल बना रहे हैं। ठीक इसी वजह से हमें इस आलोचना पर विचार करना चाहिए।

आँकड़े लोगों पर असर डालते हैं, और इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं। शोधकर्ता Caitlin Petre ने 2015 में ही Tow Center के लिए किए गए एक अध्ययन में बताया था कि पाठकों तक पहुँच के आँकड़े और रैंकिंग किस तरह प्रतिस्पर्धा, अपने काम को सराहे जाने का एहसास, दबाव और अपनी क्षमता पर संदेह जैसी प्रतिक्रियाएँ पैदा कर सकते हैं। डैशबोर्ड इस बात को प्रभावित करता है कि लोग किस पर ध्यान देते हैं और अपने काम का मूल्यांकन कैसे करते हैं।

लेकिन हमारे लिए इस चर्चा में आँकड़ों के साथ होने वाले एक और अनुभव की भी जगह है: समय के साथ अपनी वेबसाइट की नब्ज़ समझ में आने लग सकती है। दिन कैसा बीत रहा है, कौन-सी खबरें लोगों तक पहुँच रही हैं और कहाँ कुछ ऐसा हो रहा है जिस पर दोबारा नज़र डालनी चाहिए।

शुरुआत में शायद मुख्य रूप से एक संख्या ही दिखती है: अभी इतने लोग वेबसाइट पर हैं। धीरे-धीरे इन उतार-चढ़ावों का संदर्भ समझ में आने लगता है। हमें पता होता है कि एक सामान्य सुबह कैसी बीतती है। हम देखते हैं कि न्यूज़लेटर भेजने के बाद क्या होता है। हमारी नज़र इस पर जाती है कि कोई पुराना लेख अचानक फिर पढ़ा जाने लगा है या किसी खबर में लोगों की दिलचस्पी उम्मीद से ज़्यादा देर तक बनी हुई है।

यह समझ नियमित रूप से देखने और संपादकीय अनुभव के मेल से बनती है। हमें पता होता है कि क्या प्रकाशित हुआ है, किस खबर को वेबसाइट पर अलग जगह दी गई है और कौन-सी घटनाएँ दिन की दिशा तय कर रही हैं। आँकड़े इस जानकारी को और समृद्ध करते हैं।

वे हमारी अपनी धारणाओं पर सवाल भी खड़े कर सकते हैं। शायद जिस विषय को हम सीमित पाठक वर्ग का मानते थे, उसमें उम्मीद से ज़्यादा लोगों की दिलचस्पी हो। शायद विषय को ध्यान से समझाने वाला लेख अब भी पढ़ा जा रहा हो, जबकि ताज़ा खबर कब की लोगों की नज़र से ओझल हो चुकी हो। ऐसी बातें किसी विषय को अधिक जगह देने का कारण बन सकती हैं।

यह कितना उपयोगी हो सकता है, इसे एक साधारण उदाहरण से समझ सकते हैं: कुछ महीने पहले किसी संपादकीय टीम ने बताया था कि ट्रेन रद्द होने पर यात्रियों के क्या अधिकार होते हैं। ट्रेन सेवाओं में बड़ी बाधा आने पर अचानक उस लेख पर फिर से बहुत लोग आने लगते हैं।

अब टीम के सामने ठोस सवाल हैं। क्या जानकारी अब भी सही है? क्या मुआवज़े के नियम बदल गए हैं? क्या आगे की जानकारी देने वाले लिंक काम कर रहे हैं? क्या लेख में मौजूदा स्थिति के बारे में कोई नोट जोड़ना चाहिए?

अगर संपादकीय टीम लेख में दोबारा बढ़ी दिलचस्पी को देख ले, तो वह उसकी जाँच उस समय कर सकती है जब लोग उसका इस्तेमाल कर रहे हों। इसकी संपादकीय अहमियत सिर्फ़ पेज व्यू की संख्या से कहीं आगे जाती है।

कम लोगों का किसी खबर पर ध्यान देना भी उपयोगी संकेत हो सकता है। मान लीजिए, कोई संपादकीय टीम स्थानीय स्कूलों के वित्तपोषण पर एक अहम खबर प्रकाशित करती है। लेख पर बहुत कम लोग आते हैं।

सिर्फ़ इससे यह तय नहीं हो जाता कि लोगों को विषय में दिलचस्पी है या नहीं। शायद खबर होमपेज पर बहुत नीचे हो। शायद शीर्षक इतना अस्पष्ट हो कि कोई समझ ही न पाए कि इस फ़ैसले का उसके परिवार पर क्या असर होगा। शायद विषय को और समय चाहिए।

इससे पहले कि टीम यह निष्कर्ष निकाले कि आगे से ऐसी खबरें कम करनी चाहिए, इन संभावनाओं पर ग़ौर करना उपयोगी होगा। अधिक स्पष्ट शीर्षक या असर को आसानी से समझाने वाला विवरण किसी अहम विषय को उसके पाठकों तक पहुँचने में मदद कर सकता है। बेशक, लेख को वह जानकारी देनी चाहिए जिसका वादा शीर्षक करता है।

फिर भी आँकड़ों की सीमाएँ बनी रहती हैं। एक पेज व्यू सबसे पहले इतना बताता है कि कोई पेज खोला गया। उससे न तो सहमति का पता चलता है, न भरोसे का, न पत्रकारिता की गुणवत्ता का। और जो लोग वेबसाइट तक पहुँचते ही नहीं, वे इस नज़रिए से काफ़ी हद तक अदृश्य रहते हैं।

ऊपर जाते ग्राफ़ से भी हर बार वजह साफ़ नहीं होती। खबर को अधिक प्रमुख जगह मिलना, किसी दूसरी वेबसाइट से लिंक आना या कोई मौजूदा घटना, इनमें से कोई बात भूमिका निभा सकती है। आँकड़ों से सीखने के लिए उनके संदर्भ को ध्यान में रखना और दूसरी बातों पर भी ग़ौर करना ज़रूरी है। Reuters Institute भी यही उद्देश्य बताता है: एनालिटिक्स प्रासंगिक जानकारी देकर संपादकीय विवेक को बेहतर आधार दें।

इसलिए संपादकीय टीम को स्पष्ट होना चाहिए कि वह लाइव डेटा का इस्तेमाल किस काम के लिए करती है। सबसे ज़्यादा पढ़े गए लेखों की सूची, सबसे अच्छे पत्रकारिता कार्य की रैंकिंग के तौर पर उपयुक्त नहीं है। विषय, पाठक वर्ग, वेबसाइट पर खबरों की जगह और प्रकाशन का समय इतने अलग होते हैं कि ऐसी तुलना उचित नहीं ठहरती।

उतनी ही ज़रूरी यह आज़ादी है कि किसी खबर की मौजूदा पहुँच से अलग, उस पर काम जारी रखा जा सके। किसी गड़बड़ी की पड़ताल होनी चाहिए, भले ही शुरुआत में उसका असर कम लोगों पर पड़ता हो। संदर्भ को सावधानी से समझाने वाले लेख के लिए जगह होनी चाहिए, भले ही उस समय कोई मनोरंजक खबर कहीं ज़्यादा लोगों का ध्यान खींच रही हो।

रोज़मर्रा के काम में इसका मतलब यह भी है कि हम स्क्रीन से नज़र हटा सकें। किसी पड़ताल के दौरान किसी को भी पाठकों की संख्या में हर उतार-चढ़ाव देखते रहने की ज़रूरत नहीं है। लाइव डेटा तब मददगार होता है जब कोई ठोस फ़ैसला लेना हो। कोई खबर कई हफ़्तों तक क्या असर छोड़ती है, इसे समझने के लिए वैसे भी लंबा समय और प्रतिक्रिया के दूसरे ज़रिए चाहिए।

हमारे लिए इससे NowMetrix का एक स्पष्ट उद्देश्य बनता है: संपादकीय टीमें जल्दी समझ सकें कि उनकी वेबसाइट पर अभी क्या हो रहा है। उन्हें ऐसे संकेत मिलें जिनसे वे अपनी पत्रकारिता को लोगों तक बेहतर ढंग से पहुँचा सकें और उसे अधिक अद्यतन तथा उपयोगी बना सकें।

अपनी वेबसाइट की नब्ज़ समझने में यह भी शामिल है कि आँकड़ों को संदर्भ में रखा जा सके और कभी-कभी उन्हें सोच-समझकर दरकिनार भी किया जा सके। कभी कोई खबर होमपेज पर इसलिए बनी रहती है क्योंकि संपादकीय टीम उसे अहम मानती है। भले ही कोई दूसरी खबर उस समय ज़्यादा क्लिक ला रही हो।

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